motivational story in hindi Eklavya

एकलव्य से सीखे गुरुभक्ति motivational story in hindi Eklavya

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एकलव्य से सीखे गुरुभक्ति| motivational story in hindi Eklavya

एकलव्य हिरणय धनु नामक निषाद का पुत्र था जो की द्रोणाचार्य से धनुर विद्दा शीखना चाहता था ! लेकिन नीच वर्ण का मतलब नीची जाती का होने के कारन द्रोणाचार्य ने अपना शिष्य बनाने से इंकार कर दिया ! motivational story in hindi Eklavya की कहानी यही से start होती है !

एकलव्य की गुरु भक्ति

आचार्य द्रोण अपने राजकुमारों को धनुर्विद्दा की विधिवत शिक्षा प्रदान कर रहे थे !

उस वक्त अर्जुन सभी राजकुमारों में अत्यंत प्रतिभावान और गुरुभक्त होने के कारन द्रोणाचार्य के सबसे प्रिय शिष्य में से एक थे !

वैसे द्रोणाचार्य का अपने सुपुत्र अस्व्त्थामा पर भी विशेष रूप से ध्यान था ! इसलिए धनुर्विद्दा में वो सबसे आगे भी थे !

लेकिन कहीं न कही अर्जुन धनुर्विद्दा में अस्व्त्थामा से भी आगे थे !

एक बार सभी शिक्षा लेने के बाद जब गुरु के आश्रम में रात्रि का भोजन कर ही रहे थे की अचानक हवा के झोके से दीपक भुज गया !

लेकिन उसी वक्त अर्जुन के दिमाग में एक सुझाव आया की अंधकार होने के बावजूद भोजन के कोर को हाथ मुह तक ले जाता है !

इस घटना से अर्जुन ने शीखा की निशाना लगाने के लिए प्रकाश से अधिक अभ्याश की आवश्यकता है ! और वो आज के बाद अँधेरे में भी निशाना लगाने का प्रयाश करते रहे !

यह देखकर गुरु द्रोणाचार्य को बहुत अच्छा लगा और अर्जुन को धनुर्विद्दा के साथ साथ गदा तोमर तलवार आदि के प्रयोग में निपुण कर दिया !

एकलव्य और द्रोणाचार्य की कहानी

उसी वक्त एकलव्य द्रोणाचार्य के पास धनुर्विद्दा का ज्ञान लेने उसके आश्रम में आये ! लेकिन नीच वर्ण का होने के कारन उसको मना कर दिया गया !

इससे नाराज होकर एकलव्य जंगल में चला गया और एकांत जगह पर द्रोणाचार्य की मिटटी की मूर्ती बनाकर उनको गुरु मानने लगे ! और दिन रात धनुर्विद्दा का अभ्याश करने लगे !

कुछ ही दिनों में एकलव्य धनुर्विद्दा में निपुण हो गये !

एकलव्य की द्रोणाचार्य से मुलाकात

एक समय सभी राजकुमार अपने गुरु के साथ उसी जंगल में आखेट पर गये तभी द्रोणाचार्य का कुत्ता भटकता हुआ एकलव्य के पास पहुच जाता है ! और भोंकना शुरू हो जाता है !

यह देखकर एकलव्य ने कुत्ते के मुह पर इस प्रकार निशाना लगाया की कुत्ता मर भी ना सके और भोंकना भी बंद करदे !

कुत्ते के लोटने पर धनुर्विद्दा के इस कोशल को देखकर अर्जुन को लगा की यह तो कोई मेरे से भी अधिक धनुर्विद्दा में निपुण लगता है ! जबकि द्रोणाचार्य नहीं चाहते थे की इस दुनिया में कोई अर्जुन से भी निपुण हो !

जब द्रोणाचार्य एकलव्य के पास पहुचे और बोले हे वत्स क्या आपने कुत्ते के मुह पर बाण चलाया है ! एकलव्य ने इस बात को स्वीकार किया और बोला हाजी मैंने ही चलाया है

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द्रोणाचार्य :- तुमने यह कैसे शीखा आखिर तुम्हारा गुरु कोन है !

एकलव्य :- स्वामी में आपको ही गुरु मानता हु मैंने आप से ही यह सब शीखा है ! यह देखो मिटटी की मूर्ती की तरफ इशारा करते हुए ! आप हमेशा मेरे सामने होते है !

द्रोणाचार्य :- अगर तुम मुझे गुरु मानते हो तो तुम्हे गुरुदक्षणा देनी होगी !

एकलव्य :- जी गुरुदेव आप गुरुदक्षणा के रूप में जो मांगोगे में देने के लिए तैयार हु !

द्रोणाचार्य :- मुझे आपके दाहिने हाथ का अंगूठा चाहिए !

एकलव्य ने ख़ुशी ख़ुशी अपने गुरु को अंगूठा दान देदिया

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जब एकलव्य ने अपना अंगूठा गुरु द्रोणाचार्य को दे दिया तो एकलव्य धनुर विद्दा में असफल हो गये ! लेकिन एकलव्य ने अपने पैर के अंगूठे से धनुष चलाने के अभ्याश शुरू किया और कुछ ही दिनों में वह फिर धनुर्विद्दा में निपुण हो गये !

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Final word

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